
17 अक्टूबर को दिनेशपुर क्षेत्र में तड़के हुए पुलिस और 2 बदमाशों के बीच मुठभेड़ में जहाँ एक शातिर बदमाश मनोज कुमार घायल भी हुआ और पुलिस नें अवैध तमंचो की एक खेप जो ऊधमसिंह नगर से सटे बरेली जनपद के बदायू से लाकर ऊधम सिंह नगर में बेची जानी थी को सफलता पूर्वक निष्क्रिय किया। पुलिस विभाग के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार बदमाश मनोज कुमार और अनमोल यादव ने बताया कि वे रुद्रपुर के रम्पुरा निवासी बंटी कोली के संपर्क में थे। पुलिस के अनुसार, बंटी कोली पूर्व में एक पुलिस मुठभेड़ में घायल हुआ था और वर्तमान में जेल में बंद है।
आरोपियों ने बताया कि वे उक्त असलहो की खेप ग्राम बिसौली, जनपद बदायूं निवासी महावीर नामक व्यक्ति से लेकर आए थे। इन तमंचों को ₹5,000 प्रति तमंचे की दर से खरीदकर ₹8,000 प्रति तमंचे की दर से बेचने की योजना थी पर समय रहते ऊधमसिंह नगर पुलिस की सजगता नें उनके मनसूबो पर पानी फेर दिया।
एक सवाल और पुलिस का मनोबल खत्म।
ऊधमसिंह नगर पुलिस नें जिस मेहनत और मशक्त से इस बड़ी कार्यवाही को अंजाम दिया और जिसकी तारीफ भी की जानी चाहिए थी पर घटना को लेकर एसएसपी अजय गणपति द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पत्रकार द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब के बाद असहज होने के चलते या यूँ कहें की उपलब्धि पर सवाल खड़े करने वाले सवाल पर निराश होने से बाहर जाने के लिए कहने का बयान जो सोशल मीडिया में वाइरल हुआ, पुलिस की उस पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। और पुलिस अधिकारीयों के जिस मनोबल को प्रोत्साहन देकर बढ़ाया जाना चाहिए था वो पूरी तरह से चूर चूर हो गया। और वहीं एक बड़ी खबर कहीं ना कहीं एक छोटे से घटनाक्रम के चलते दब गई।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुए विवाद के बाद भले ही उस मामले का पटाक्षेप कुछ ही घंटो में हो गया पर बावजूद उसके सोशल मीडिया में पुलिस अधिकारी आरोपों के घेरे में खड़े हो गए। जो पुलिसकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर अपराधियों का सामना करते हैं, उनका मनोबल बनाए रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
पुलिस से सवाल करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सवालों की आड़ में उसका उपहास उड़ाना और साहसिक कार्रवाई को बदनाम करना उचित नहीं। आलोचना तथ्यों पर होनी चाहिए, पूर्वाग्रह और सनसनी पर नहीं। अपराधियों के हौसले नहीं, कानून का इकबाल बुलंद होना चाहिए।
एक बड़ा सवाल ये भी बनता है की आखिर वो अपराधी कौन थे जो मुठभेड़ में घायल हुए क्या वो निर्दोष थे? आँखिर कैसे 4 महीने पहले एक शातिर अपराधी मनोज जिसे ऊधमसिंह नगर नें जेल भेजा था और उसे लचर न्यायपालिका से महज दो महीने के कारावास के बाद ही जमानत भी मिल गई और वो शातिर अपराधी फिर अपने अवैध असलहो के कारोबार में लग गया। और इस बार अगर फिर सीमावर्ती क्षेत्रों से अवैध असलहो को जिले में ले आया जाता तो कहीं ना कहीं फिर पुलिस सवालों के घेरे में खड़ी होती। पर ऊधमसिंह नगर पुलिस नें बावजूद इसके तत्परता दिखाते हुए उन असलहो से बड़े अपराधो को होने से पहले ही रोक दिया।
अब सोचना हमें है की क्या हमेशा पुलिस को ही सवालों के घेरे में खड़े करने से क्या पुलिस का मनोबल नहीं गिरता? और हम उम्मीद करते हैं की समाज भयमुक्त रहे।

