
एक सितंबर 1803 को गढ़वाल हिमालय में आए विनाशकारी भूकंप ने श्रीनगर समेत उत्तर भारत के बड़े हिस्से को हिला दिया था। दो शताब्दी से अधिक बाद भी यह भूकंप हिमालयी क्षेत्र में जमा ऊर्जा और भविष्य के बड़े भूकंपों के खतरे की याद दिलाता है।
एक सितंबर 1803 को गढ़वाल के हिमालय में आए भूकंप को उत्तर भारत की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है। दो शताब्दी से अधिक समय बाद भी यह भूकंप वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है। आधुनिक अध्ययनों में इसकी तीव्रता 7.3 से 8.1 एमडब्ल्यू आंकी गई है, जबकि 2023 के एक अध्ययन में इसे 8.1 एमडब्ल्यू का माना गया है।
श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के कुलपति एके महाजन बताते हैं कि इस भूकंप के झटके पंजाब से बंगाल तक महसूस हुए थे। गढ़वाल हिमालय में सबसे अधिक तबाही हुई थी। गंगा के मैदानी इलाकों में भी भवनों को नुकसान पहुंचा, जमीन में दरारें आईं और मिट्टी का द्रवीकरण हुआ। उस समय गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में भारी विनाश हुआ। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार सैकड़ों मकान ध्वस्त हुए और शहर का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया।
एक अध्ययन के मुताबिक श्रीनगर में करीब 500 से 1,000 मकान नष्ट होने का अनुमान है। उत्तरकाशी के बाड़ाहाट में भी भारी तबाही हुई थी। शोधकर्ताओं के अनुसार वहां 200 से 300 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। कुतुब मीनार का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त था। उस समय आधुनिक उपकरण नहीं होने से इसके सटीक केंद्र और परिमाण को लेकर वैज्ञानिकों में मतभेद रहे हैं।

