उत्तराखंड के प्रसिद्ध तुंगनाथ-चोपता क्षेत्र की प्राकृतिक खूबसूरती पर प्रदूषण का साया गहराने लगा है। बढ़ती पर्यटक संख्या के साथ प्लास्टिक कचरा और गंदगी बुग्यालों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिससे हिमालयी पारिस्थितिकी और वन्यजीवों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।
गढ़वाल में स्थित तुंगनाथ मंदिर का पवित्र इलाका जिसे तृतीय केदार कहा जाता है और चोपता की खूबसूरत घाटियां हर साल हज़ारों श्रद्धालुओं, ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचती हैं। जहां कुछ सैलानी हिमालय के नजारे और बर्फ की चादर देखने आते हैं, वहीं कुछ लोग बाबा तुंगनाथ के मंदिर में आशीर्वाद पाने के लिए मुश्किल ट्रेकिंग करते हैं। लेकिन अब इस इलाके की प्राकृतिक सुंदरता फीकी पड़ रही है। इसकी वजह है इधर-उधर बिखरा प्लास्टिक कचरा और गंदगी।

क्षेत्र में बढ़ते पर्यटन और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के सुंदर बुग्याल (घास के मैदान) सिमट रहे हैं। इससे राज्य पक्षी हिमालयन मोनाल सहित कई प्रजातियां भी संकट में हैं। इलाके में हिमालयन मोनाल तो नहीं दिखते, लेकिन पर्यटकों के लिए बने अस्थायी शौचालयों की गंदगी, हर तरफ बिखरे प्लास्टिक रैपर और घास के मैदान की ढलान से बहता गंदा पानी ज़रूर दिखा।
हर साल करीब पांच से छह लाख लोग तुंगनाथ का दौरा हैं करते
चोपता घाटी हिमालयन मोनाल, थार और रेड फॉक्स जैसी प्रजातियों से समृद्ध है। इसे वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा प्राप्त है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की भारी भीड़ ने इन प्रजातियों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। स्थानीय लोगों और मंदिर के पुजारियों ने प्राकृतिक जैव-विविधता के नुकसान पर चिंता जताई है।
तीर्थ पुरोहित रेवाधर मैथानी ने बताया कि पर्यटक निर्देशों की अनदेखी करते हैं। वे पक्के रास्तों पर चलने के बजाय घास के मैदानों पर चलते हैं। इससे मुलायम घास खराब होती है और मिट्टी का कटाव बढ़ता है। हर साल करीब पांच से छह लाख लोग तुंगनाथ का दौरा करते हैं। पर्यटन का चरम दौर पक्षियों के प्रजनन काल से मेल खाता है। पर्यटक फूल तोड़ते हैं और घास कुचलते हैं, ऐसी हरकतें इस इलाके के पेड़-पौधों और जानवरों के प्राकृतिक पनपने के चक्र को बिगाड़ती हैं।